तो क्या शिवराज सरकार ने किसानों के आंदोलन को सही तरीके से हैन्डिल नहीं किया?


एसपी मित्तल
मंदसौर में गोली लगने से 5 किसानों की मौत के विरोध में 7 जून को मध्य प्रदेश बंद रहा। किसानों का जो आंदोलन सड़कों पर सब्जी और दूध फैंकने से शुरू हुआ था, वह अब गोलीकांड और हिंसक वारदातों में तब्दील हो गया है। 7 जून को मंदसौर के डीएम स्वतंत्र सिंह को भीड़ से थप्पड़ खाने पड़े तो एबीपी न्यूज चैनल के संवाददाता ब्रिजेश राजपूत बिना किसी कारण के पिट लिए।
हाईवे पर चल रहे ट्रकों में आग लगाई जा रही है तो किसानों के द्वारा प्रशासन के अधिकारियों और पुलिस वालों पर पत्थर फैंके जा रहे हैं। एमपी की शिवराज सरकार हालातों से कैसे निपट रही है, इसका अंदाजा मंदौसर के गोलीकांड से लगाया जा सकता है। अभी तक भी यह साफ नहीं हो रहा है कि किसान किसकी गोली से मरे? डीएम कहते हैं कि प्रशासन ने गोली चलाने का आदेश नहीं दिया। अब कहा जा रहा है कि सीआरपीएफ के जवानों ने आत्मरक्षा में गोली चला दी। समझ में नहीं आता कि आखिर इतने लोकप्रिय मुख्यमंत्री शिवराज सिंह के शासन में यह क्या हो रहा है?
आंदोलन की शुरूआत भारतीय किसान संघ की ओर से की गई थी। लेकिन बाद में भारतीय किसान मजदूर संगठन जैसे संगठन भी आंदोलन में शामिल हो गए। सरकार ने भारतीय किसान संघ के प्रतिनिधियों को बुलाकर 8 मांग मान ली। शायद यहीं पहली चूक हो गई। अच्छा होता कि सरकार सभी किसान संगठनों के प्रतिनिधियों को बुलाकर संवाद करती। जहां तक मंदसौर में गोली चलने का मामला है तो यहां भी सरकार की चूक नजर आ रही है। सीआरपीएफ के जवानों की तैनाती सरकार की सहमति से ही होती है। लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि मंदसौर में सीआरपीएफ के अधिकारियों और जिला प्रशासन के बीच तालमेल नहीं रहा।
जहां तक आंदोलन में कांग्रेस के राजनीति करने का सवाल है तो इस पर किसी को भी एतराज नहीं होना चाहिए। भाजपा जब विपक्ष में होती है तो आंदोलन की सहभागी होती है। अब यदि किसान आंदोलन से कांग्रेस जुड़ रही है तो इस पर एतराज होना ही नहीं चाहिए। जहां तक किसान आंदोलन में असामाजिक तत्वों का सवाल है तो सरकार को ऐसे तत्वों के खिलाफ कार्यवाही करनी चाहिए। यह सही है कि इस बार मध्य प्रदेश में कृषि का उत्पादन 20 प्रतिशत तक पहुंचा है, जो पहले मात्र 4 प्रतिशत था। ऐसे में किसानों को बाजार में उचित मूल्य नहीं मिल रहा है। इसे सरकार की नीतियों का ही दोष कहा जाएगा। जो दूध गांव में 20 रुपए प्रति किलो के भाव से मिलता है, वह शहरों में 50 रुपए किलो तक बिकता है।
इसी प्रकार मौसमी सब्जियां किसानों से 5 रुपए से लेकर 10 रुपए किलो के भाव खरीदी जाती है और बाजार में उपभोक्ताओं को 40 से लेकर 60 रुपए किलो तक बेची जाती है। यानि किसान और उपभोक्ता के बीच ऐसे दलाल सक्रिय हैं जो बिना श्रम किए रुपया कमा रहे हैं। सरकार हर बार यह दावा करती है कि किसान और उपभोक्ता के बीच से बिचौलियों को हटाया जाएगा। लेकिन ऐसा संभव नहीं हो पा रहा है। आज भी यदि मध्य प्रदेश में बिचौलियों को हटा दिया जाए तो किसानों को अपने उत्पाद का उचित ही नहीं अधिक मूल्य मिल सकता है। 
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