अब तो मजाक बन गए शहरी जन कल्याण शिविर


एसपी मित्तल
राज्य सरकार के निर्देंशों की अवहेलना न हो, इसलिए अफसरशाही में अजमेर नगर निगम और अजमेर विकास प्राधिकरण के परिसर में ही मुख्यमंत्री शहरी जन कल्याण शिविर लगा दिए हैं। इसे मजाक ही कहा जाएगा कि लोगों के कामों को निपटाने के लिए सरकारी दफ्तर में ही शिविर लगाए गए हैं। सवाल उठता है कि जब टैंट लगाकर शिविर में ही काम निपटाए जा सकते हैं तो फिर बड़े-बड़े भवन क्यों बनाए जाते हैं? निगम और एडीए परिसर में शिविर लगने से साफ जाहिर है कि इन दफ्तरों में सामान्य दिनों में काम होता ही नही हैं।
बड़ी अजीब बात है कि एक अधिकारी अपने कक्ष में बैठकर काम नहीं करता, लेकिन दफ्तर के परिसर में ही टैंट में बैठकर काम कने को तैयार है। जानकारों की माने तो मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे की नाराजगी से बचाने के लिए ही अफसरों ने एडीए और निगम परिसर में शिविर लगाने का निर्णय लिया है। मुख्यमंत्री के निर्देंशों के मुताबिक इन दोनों संस्थानों को वार्ड स्तर पर जन कल्याण शिविर लगाने थे। शुरू में वार्ड स्तर पर शिविर लगाए भी गए लेकिन मौके पर काम नहीं होने की वजह से शिविरों में लोग आए ही नहीं। असल में अखबारों में छपवा दिया गया कि इन शिविरों में जन्म, मृत्यु प्रमाण पत्र से लेकर भूखण्डों का नियमन तक किया जाएगा। लेकिन स्पष्ट दिशा-निर्देंशों के अभाव में अफसरों ने जरूरतमंदों को कोई राहत नहीं दी।
जब वार्ड स्तर पर शिविरों में कोई नहीं आया तो एडीए और निगम परिसर में ही शिविर लगा दिए गए ताकि सरकार को बताया जा सके कि शिविर आयोजित हुए हैं। अफसरों को इस बात का संतोष है कि अब सरकारी परिसर में ही शिविर लगने से टैंट आदि का खर्चा कम हो गया है। सरकार माने या नहीं लेकिन कमोबेश यही स्थिति प्रदेश भर में है। एक ओर आम लोगों का कोई काम नहीं हो रहा तो दूसरी ओर शिविरों के नाम पर करोड़ों रुपया खर्च हो रहा है।
आपस में ही है विवाद :
आम लोगों की समस्याओं के समाधान की बात तो दूर की है। अजमेर में तो नगर निगम और एडीए के बीच का विवाद ही नहीं निपट रहा है। निगम ने उसके सीमा क्षेत्र में एडीए द्वारा मानचित्र स्वीकृत किए जाने पर आपत्ति दर्ज करवाई है। निगम का आरोप है कि एडीए मानचित्र स्वीकृत कर निगम को आर्थिक नुकसान पहुंचा रहा है। अच्छा हो कि पहले एडीए और निगम अपने विवाद सुलझा लें।
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