जो परम्परा हमारे राजनैतिक दलों ने शुरू की है वह आज समस्या बन चुकी है?


कर्जमाफी का रोग बढ़ता ही जा रहा है और जो परम्परा हमारे राजनैतिक दलों ने शुरू की है वह आज समस्या का रूप लेती जा रही है। पिछले लोकसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस ने देश के सभी छोटे बड़े किसानों का कर्ज माफ करके सत्ता हासिल कर ली थी इस बार वहीं खेल विधानसभा चुनाव के दौरान भी खेला गया था।
शुरूआत कांग्रेस ने की और उसका अनुसरण बसपा सपा व भाजपा ने भी किया था।परिणाम यह हुआ कि मतदाताओं ने भाजपा पर यकीन करके उसे प्रचंड बहुमत दे दिया।किसानों की कर्जमाफी को लेकर इस बार भी बैकों ने विरोध किया था लेकिन सत्ता हासिल करने की धुन में किसी ने भी ध्यान नहीं दिया।
यह सही है कि कर्जमाफी देशहित में उचित नहीं होती है लेकिन कर्ज कर्ज होता है चाहे किसानों का हो चाहे उद्योगपतियों का हो।किसानों का कर्ज तो दो चार बार ही हुआ है लेकिन उद्योगपतियों का कर्ज तो हर बार सरकार माफ करती है।उद्योगपतियों की कर्जमाफी पर कभी इतना हो हल्ला नहीं होता है जितना किसानों के लिये होता है।किसान आजतक कभी भी अपने बलबूते पर कोई आन्दोलन नहीं करता है वह आन्दोलन तभी करता है जबकि उसे राजनैतिक लोग भड़काकर उसके कंधे पर बन्दूक रखकर फायर करते हैं।
परसों मध्यप्रदेश के मंदसौर में कर्जमाफी सहित अन्य माँगों को लेकर आन्दोलित  किसानों या पुलिस के साथ जो कुछ हुआ उसकी जितनी भी निंदा की जाय उतनी कम है।पुलिस खुद कुछ नहीं करती है बल्कि उसे जैसा हुक्म मिलता है वैसा ही कार्य करती है।इसमें छः किसानों की मौत हो गयी है तथा तमाम लोग घायल हो गये है।इस हिंसक आन्दोलन में पुलिस वालों की आंख फूट गयी और कई घायल भी हो गये हैं।गोली बन्दूक की स्थिति तब बनी जब किसान हिंसक हो गये और वाहनों को जलाने लगे।
यह बात अलग है कि आगजनी व हिंसा फैलाने वाले कोई दूसरे थे और गोली खाने वाले बेगुनाह किसान थे।सवाल तो इस बात का है कि आखिर किसान इतने उग्र कैसे हो गये? किसने इन्हें उत्तेजित करके हिंसक बना दिया और कौन लोग हैं जो अभी भी किसानों को उग्र बनाये हुये हैं? फसल का उचित मूल्य माँगना या कर्जमाफी की माँग करना कोई गुनाह नहीं है लेकिन अपनी माँगों के समर्थन में हिंसक होना उचित नहीं होता है।किसान एक ऐसा वर्ग होता है जो राजनैतिक दलों की इच्छापूर्ति करता है और सभी उसे अपने पक्ष में करने के लिये राजनैतिक दाँव खेलते रहते हैं।
मध्यप्रदेश के मंदसौर में कुछ ऐसा ही खेल खेले जाने की आशंका है।किसान इतना भोला भाला होता है कि जो उससे हमदर्दी के साथ उसके पक्ष में बात करने लगता है वह उसी पर विश्वास करके उसके इशारे पर चलने लगता है।यह सही है कि किसान समस्याओं से घिरा हुआ है और वह दया का पात्र है।किसान ही एक ऐसा उत्पादक है जिसकी जमापूंजी सुरक्षित नहीं रहती है और वह एक अभ्यस्त जुआरी की तरह हर फसल में दांव लगाता है।उसकी फसल का बीमा तो होता है लेकिन पूरी कौन कहे आधी लागत तक नहीं मिल पाती है। सरकार द्वारा उद्योगपतियों की जगह अगर दैवीय प्रकोप के शिकार किसानों का कर्ज माफ करना सर्वथा उचित है।
कर्जमाफी व उचित मूल्य को लेकर आन्दोलित किसानों के हिंसक होने की निष्पक्ष जांच और मृतक परिवारों को पाँच लाख की जगह किसान को भगवान मानकर कम से कम तीस तीस लाख रूपये दिये जाने चाहिए ताकि मृतक परिवार को आर्थिक रूप से मुखिया की कमी का अहसास न हो।
साथ ही जब उत्तर प्रदेश सरकार महाराष्ट्र सरकार अपने किसानों के कर्जमाफ कर रही हैं तो मध्यप्रदेश सरकार को भी खर्च में कटौती करके कर्ज तले दबे किसानों का कर्ज माफ कर देना चाहिए।जब हर राजनैतिक दल कर्जमाफी कर रहा है तो मध्यप्रदेश सरकार को भी ऐसा करने में  दिक्कत नहीं होनी चाहिए।
             भोलानाथ मिश्र
     वरिष्ठ पत्रकार/समाजसेवी
 रामसनेहीघाट,बाराबंकी यूपी
Previous Post Next Post

POST ADS1

POST ADS 2