वही हुआ जिसका डर था


मेहदी हसन एैनी कासमी
मुस्लिम उम्मा के सपनों के अमीन  तुर्की ने अपने पांच हजार सैनिक क़तर रवाना कर दिए हैं। तुर्की जो उदारवादी इस्लामी गणराज्य है और जो हर मौके पर मज़लूमों के साथ खड़ा दिखाई देता है।
उसने फिर से अपनी इस्लामी ग़ैरत की  झलक दिखाते हुए मिस्र की सियासी तंज़ीम इख़्वानुल मुसलिमीन  और फिलिस्तीन की सियासी व फौजी तंज़ीम हमास का समर्थन और मदद करने के कारण सऊदी अरब सहित सात देशों की नाराज़गी और बायकाट का सामना कर रहे क़तर  के साथ न सिर्फ एकजुटता दिखाई है।

बल्कि अपना सैन्य दस्ता भी क़तर की  सुरक्षा के लिए रवाना कर दिया। चूँकि क़तर पर विदेशी हमले की भी संभावना है।

ऐसे में तुर्की का यह जुर्रत भरा कदम पूरी दुनिया के इस्लामी देशों के साथ लोकतंत्र के नायकों के लिये भी मिसाल है। बस खुदा करे कि आल ए सऊद और उसके सहयोगी देशों के होश ठिकाने आएं, और वह अपनी आपराधिक रविश को छोड़ कर  क़तर से माफी मांग लें।

अन्यथा यदि आले सऊद और खाड़ी देशों ने अभी भी ट्रम्प और नितिन याहू को अपना उस्ताद मानकर उनके इशारों पर चलना बंद न किया तो एक जबरदस्त युद्ध होगी। ये सारे देश आपस में लड़ेंगें। अमेरिका और रूस अपना हथियार बेचेंगे और चुपचाप खेल का मजा लेंगे,

इसराइल पूरी दुनिया में यहूदी सरकार के गठन के लिए खून बहायेगा या चाल चलेगा, ईरान अपने चिर प्रतिद्वंद्वियों से पंथीय दुश्मनी निकालेगा और खून केवल मुसलमानों का बहेगा, नुकसान वैसे भी मुस्लिम उम्मा का ही होगा।

अलबत्ता अगर तुर्की ने इस संकट को ख़त्म करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है और बिना युद्ध के ही विवाद का निपटारा हो गया तो उसके बाद तुर्की भी एक सुपरपॉवर बनने के क़रीब हो जायेगा।
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