किसान आंदोलन कहने से पहले किसान किसे कहते हैं?


रवि शंकर
किसान आंदोलन कहने से पहले किसान किसे कहते हैं, यह समझ लें। किसान कहते हैं उस व्यक्ति को जो अपनी जमीन में खेती करता है और अपनी आवश्यकता के अनुसार अनाज-सब्जी-फल आदि का उत्पादन करता है। आखिर खेती का प्रारंभ तो ऐसे ही हुआ था न? इतना इतिहास तो सभी जानते हैं।

अब आज की स्थिति देखिए। किसानों में भी वर्गीकरण है। कुछ गन्ना किसान हैं। मतलब वे अपनी आवश्यकता का अनाज नहीं उपजाते, वे केवल गन्ना उपजाते हैं। कुछ सोयाबीन किसान हैं, कुछ प्याज किसान हैं, कुछ टमाटर किसान हैं। इनमें से कोई भी अपनी आवश्यकता के लिए कुछ नहीं उपजा रहा है। वह व्यापार करने के लिए कुछ पैदा कर रहा है।

ऐसे में उसे हम किसान कैसे कहें? वह एक माल उत्पादक फैक्ट्री है। उसका माल बिका, वह राजा हो गया, नहीं बिका, सड़क पर आ गया। फर्क केवल इतना है कि खेती में जो आर्थिक निवेश है, उसमें अचल पूंजी केवल जमीन ही है। बाकी निवेश फसल के डूबने पर डूब जाता है। ऐसे में किसान रूपी यह व्यापारी आत्महत्या करने के लिए विवश हो जाता है।

एक बात और है। ये जो खेती के व्यापारी हैं, इनका ध्यान अधिकाधिक उपज पर होता है। होना भी चाहिए, परंतु किसान तो पालक था न। केवल उत्पादक थोड़े ही न था। वह पशुओं का पालता था, वह जमीन को पालता था। तो ये पशु और जमीन मिल कर उसे इतना देते थे कि वह अपना और अन्य मनुष्यों का भी पालन करता था।

अब इन व्यापारी किसानों को देखिए। ये न तो पशु पालते हैं और न ही जमीन को। ट्रैक्टर, रासायनिक खाद, रासायनिक कीटनाशक आदि जमीन की हत्या करते हैं। पशुओं को तो पहले ही कसाईखाने की भेंट चढ़ाया जा चुका है। अब जब जमीन को माँ मानने वाला किसान अपनी भावनाओं की हत्या करके व्यापारी बन चुका है, तो उसे हमारा भावनात्मक शोषण करने की क्या आवश्यकता है?

मित्रों, चंपारण के सत्याग्रह को याद कीजिए। उसकी शताब्दी मनाई जा रही है। वहाँ किस रूप में शोषण हो रहा था? उनसे जबरन नील की खेती करवाई जा रही थी। नील की खेती किसान की आवश्यकता नहीं थी, बाजार की आवश्यकता थी। आज वही किसान स्वयं से बाजार की आवश्यकता के अनुसार खेती करने की कोशिश कर रहा है। इसमें उसे लाभ कैसे हो सकता है?

यह आंदोलन किसान का नहीं, बाजार का है। इसे असफल बनाने की पूरी कोशिश कीजिए।
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