गुड़ खाकर गुलगुले से परहेज़ करने की यह अदा राजनीती नहीं प्रहसन है क्या गांधी और गोडसे एक साथ चल सकते हैं

90 सालों से जिन्हें ये घुट्टी पिलाई जा रही है कि गांधी बुरे थे। इतने बुरे थे की एक राष्ट्रवादी (?) को उनकी हत्या करनी पड़ी। जो गांधी में शैतान देखने के आदी हो चुके हैं, साबरमती आश्रममें बैठ कर उनसे से ये अपील करना की गांधी के रास्ते पे चलो, निरपराध की हत्या न करो, जैसे प्रवचन सुन कर हंसी ऑती है।

कितना हास्यास्पद है कि गांधी के विचार से असहमति रखनेवाले साबरमती से अपने ही मानस पुत्रों से गांधी के विचारों का सम्मान करने की अपील कर रहे हैं।
चौके में बैठ कर गोडसे, सावरकर की जय और चौकी (सार्वजनिक स्थल से) से गांधी का जयकारा, भारतीय राजनीति का सबसे विद्रूप और डरावना अध्याय है।
गुड़ खाकर गुलगुले से परहेज़ करने की यह अदा राजनीती नहीं प्रहसन है। बेशक  राजनीती में किसी विचारधारा को अपनाने का हक़ सभी को है। लेकिन गोडसे और गांधी एक साथ नहीं चल सकते। औऱ जो ऐसा करते हैं वो राजनीती के माध्यम से सत्ता पर कब्ज़ा तो कर सकते हैं, देश और देश की जनता की हिफ़ाज़त कभी नहीं कर सकते।

Nazeer Malik की वॉल से
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