किसान से रिश्ता मत तोड़िये नही तो समाज टूट जाएगा?


किसान सरकारी कर्मचारियों की तरह काम बंद नहीं करता है.  सूखे, बाढ़ समेत तमाम संकट से जूझ रहा है लेकिन अपना पुरुषार्थ नहीं छोड़ता. हमें सरकार के उस भुलावे से बाहर निकलना होगा कि बड़े उद्योगपति आयेंगे और देश में बहार आ जाएगी.
सचिन कुमार जैन 
मध्य प्रदेश में किसान अब सड़क पर हैं. लोग कह रहे हैं उन्हें खेतों में या गाय-भैंसों के बाड़े में होना चाहिए. वे फल, सब्जियां और दूध मैदान में बहा रहे हैं.

शिक्षित लोग कह रहे हैं, उन्हें सब्जी, फल और दूध बर्बाद नहीं करना चाहिए. इससे किल्लत पैदा हो जायेगी और दाम बढ़ जायेंगे. मध्यमवर्गीय-शहरी समाज को सुबह की चाय न मिल पाएगी.

आजकल सुबह की चाय के बिना पेट में दबाव नहीं बनता और मल प्रवाह बाधित होता है. वैसे किसानों में पिछले आठ-दस दिनों में समाज से लेकर सरकार तक के पेट में दबाव बन दिया है, पर मल फिर भी नहीं निकल पा रहा है.

मंगलवार को मंदसौर में किसान प्रदर्शन के दौरान सरकार ने गोली चलवाई (बहरहाल सरकार इनकार कर रही है) और छः किसानों की मौत हो गयी.

हमें यह समझना होगा कि बर्तानिया हुकूमत ने फूट डालो-राज करो और तकनीक आधारित आर्थिक विकास (जिसमें श्रम को गुलाम मान जाता है) की जो नीति स्थापित की है, वह केवल उनके दायरे तक ही सीमित नहीं रही.

जब भी उपनिवेशवाद की स्थापना की पहल होती है, इन्हीं नीतियों को लागू किया जाता है. हमारी मौजूदा व्यवस्था में किसान और मजदूर राज्य के उपनिवेश हैं.

इसे बनाए रखने के लिए राजनीतिक दलों के माध्यम से ऐसे संगठन भी खड़े किये जाते हैं, जो इन समाजों के बीच मौजूद रह कर उन्हें संगठित न होने दें और बदलाव के लिए खड़े न होने दें.

मध्य प्रदेश में हाल ही में चल रहा घटनाक्रम यह साबित करता है कि कोई न कोई किसान संगठन राज्य के विस्तार के रूप में जरूर काम करता है. हिंसा किसी भी तरफ से हो, है तो अपराध ही. इसकी निंदा तो होनी ही चाहिए.

इस अपराध की यह जवाबदेयता और सजा सुनिश्चित नहीं हुई, तो राज्य समाज का विश्वास खो देगा.

हम जानते हैं कि प्रचलित रूप में राज्य व्यवस्था में राजनीतिक विचार और प्रशासनिक विचार का मेल होता है.

मध्य प्रदेश में यह कहा जा रहा है कि नौकरशाही ने राज्य जनप्रतिनिधि नेतृत्व को भुलावे में रखा. यदि ऐसा है, तो मतलब साफ़ है कि जनप्रतिनिधि नेतृत्व समाज से विलग और जुदा हो चुका है. वह सचमुच मायावी व्यवस्था में खो गया है.

यदि हमारी सरकार सच में समाज से जुड़ी होती तो उसे फसल बीमा सरीखे भांति-भांति से सम्मेलन करके ‘लोक धन’ खर्च करके लाखों लोगों की भीड़ जुटाने की जरूरत नहीं पड़ती. पिछले कुछ सालों में केवल सम्मेलनों में ही अपनी सरकार ने 3400 करोड़ रुपये खर्च किये हैं.

यही लोक धन किसानों तक पहुंचना चाहिए था, जो नहीं पहुंचा. मुझे लगता है कि प्रशासनिक तंत्र की जिम्मेदारी थी कि वह सरकार को ऐसे गैर जरूरी व्यय करने से रोकती, उसनें नहीं रोका.

हमारे मीडिया की जिम्मेदारी थी कि वह इन्हीं किसानों और मजदूरों के मसले उठाकर सरकार को अपव्यय करने से रोकती लेकिन हमारा मीडिया भी उस सत्ता के पक्ष में खड़ा हुआ क्योंकि इसी से उन्हें भी राजस्व भी मिलने वाला था.

जरा साम्प्रदायिक-शहरी-मध्यमवर्गीय हुए बिना सोचिये कि कि क्या किसान और मजदूर के बिना अपना एक दिन भी गुज़र सकता है? यदि नहीं गुज़र सकता, तो अपन चुप रहकर उनके खिलाफ़ क्यों हो जाते हैं? अतः यह मानना कि कोई एक व्यक्ति इस परिस्थिति के लिए जिम्मेदारी है, उचित नहीं है.

किसानों के संकट को देखने के बाद समझ नहीं आ रहा है कि अपनी ही सरकार पर अविश्वास कैसे करूं? यदि किसानों पर विश्वास करता हूं तो सरकार पर विश्वास करने का कोई बिंदु ही नहीं बचता.

जरा यह देखिये. वर्ष 2006-07 में मध्य प्रदेश में खाद्यान्न का कुल उत्पादन 144.52 लाख मीट्रिक टन हुआ था. जो वर्ष 2015 में बढ़ कर 321.48 लाख टन हो गया. यानी दस सालों में उत्पादन में 222 प्रतिशत की वृद्धि हुई.

मध्य प्रदेश में कुल सिंचित क्षेत्रफल वर्ष 2006 में 65.43 लाख हेक्टेयर था, जो दस साल बाद 2015 में बढ़ कर 103.01 लाख हेक्टेयर हो गया.

पर तस्वीर का दूसरा पहलू बेहद स्याह है. थोड़ा यह जान लें कि वर्ष 2001 से 2015 के बीच मध्य प्रदेश में 19,768 किसानों ने आत्महत्या की है और यह क्रम लगातार जारी है.

इसमें पिछले चार सालों में उन 768 किसानों की मृत्यु की संख्या शामिल नहीं है, जो फसल बर्बाद होने पर अपने खेतों में गए और या तो आघात से वहीं दम तोड़ दिया या घर वापस आकार चिरनिद्रा में लीन हो गए.

इन दस सालों में मध्य प्रदेश में जोतों का आकार 2.2 हेक्टेयर से कम होकर 1.78 हेक्टेयर हो गया.

इन्हीं दस सालों में मध्य प्रदेश में काश्तकारों की संख्या 110.38 लाख से घट कर 98.44 लाख पर आ गई. यानी 11.94 लाख काश्तकार कम हो गए. इसे विकास मत मानिए, क्योंकि काश्तकार खेतिहर मजदूर में बदल दिए गए हैं.

इन दस सालों में मध्य प्रदेश में खेतिहर मजदूरों की संख्या 74.01 लाख से बढ़ कर 121.92 लाख हो गयी. क्या सरकार का वायदा यही था कि लोगों को मजदूर बनाया जाएगा. वस्तुतः मध्य प्रदेश में मजदूरों की संख्या में 47.92 लाख की बढ़ोतरी हुई.

नेशनल सैम्पल सर्वे आर्गनाइजेशन की रिपोर्ट (क्रमांक 576/अप्रैल 2016 में जारी) के मुताबिक मध्य प्रदेश के 70.8 प्रतिशत ग्रामीण परिवार खेती पर निर्भर हैं. इन कृषि परिवारों की कुल आय औसतन 6,210 रुपये मासिक थी, इसमें से खेती से आय का हिस्सा 4,016 रुपये था.

इस औसत तो जरा खोलकर देखने पर पता चलता है कि आदिवासियों और दलितों की स्थिति और ज्यादा बुरी है. आदिवासी किसान परिवार की कुल मासिक आय 4,725 रुपये हैं, इसमें से 2,002 रुपये खेती से अर्जित होते हैं. जबकि दलित किसानों की मासिक आय 4,725 रुपये है, इसमें से 2,607 रुपये खेती से हासिल होते हैं.

बहरहाल, अन्य पिछड़ा वर्ग के खेती आधारित परिवार 7,823 रुपये की आय हासिल करते हैं, जिसमें से 5,534 रुपये का योगदान खेती करती है.

यह जरूरी नहीं कि हम अभी चल रहे किसान आंदोलन को सामाजिक वर्ग आधारित नज़रिए से ही देखें, लेकिन यह जान लेना जरूरी है कि यह आंदोलन तुलनात्मक रूप से बड़े और ताकतवर किसानों के नेतृत्व का आन्दोलन है. छोटे और मझौले किसान इसके केन्द्र में नहीं हैं.

बहरहाल खेती के सवाल और संकट सभी किसानों के लिए मायने रखते हैं. अतः खेती के मसलों पर बात करना जरूरी है. जिन जिलों में किसान आंदोलन चल रहा है, वे जिले मध्य प्रदेश में गेहूं, सरसों, मक्का, सोयाबीन और कपास का सबसे ज्यादा उत्पादन करने वाले जिले माने जाते हैं.

इसका मतलब यह भी है कि नकद फसलों के विस्तार ने संकट को इतना बढ़ा दिया है कि आर्थिक विकास की खेती ने किसानों को बर्बादी के कगार पर ला खड़ा दिया है. मंदसौर सरसों की सबसे ज्यादा उत्पादकता वाला जिला है. सोयाबीन उत्पादन में तीसरे क्रम का जिला है.

मध्य प्रदेश में 98.44 लाख परिवार खेती पर निर्भर हैं और राज्य में औसतन एक परिवार पर 32,100 रुपये का कृषि क़र्ज़ है.

सबसे पहली बात यह है कि भोपाल, इंदौर, जबलपुर, ग्वालियर की नगर सीमा (नगर और ग्राम की सीमा रेखा उतनी ही संवेदनशील है, जितनी कि भारत-चीन और अमेरिका-मैक्सिको की सीमाए हैं) के भीतर जिंदगी जीने वाले लोगों को यह समझना होगा कि किसानों और मजदूरों के मुद्दे, केवल किसानों-मजदूरों के नहीं हैं.

आज किसान अपना जीवन बचाने की जद्दोजहद में है. वह सरकारी कर्मचारियों की तरह काम बंद नहीं करता है. संकट में है, सूखे, बाढ़, नकली बीज, बिजली के करंट और फसल की कम कीमत से जूझ रहा है, पर अपना पुरुषार्थ नहीं छोड़ता.

जिस दिन वह भी काम बंद कर देगा, दाल-रोटी-दूध-सब्जी के लाले पड़ जायेंगे. हमें सरकार के उस भुलावे से बाहर निकालना होगा, जो बार-बार यह बताती है कि बड़े उद्योगपति आयेंगे और देश चमन हो जाएगा.

वास्तव में पिछले कुछ सालों में सामने-सामने किसानों की बात होती रही, पर पिछवाड़े में पूंजी-सत्ता की रासलीला रची जाती रही है.

आखिर किसान चाहता क्या है?

एक: उसे उसके उत्पादन की न्यायोचित कीमत मिले. आज की स्थिति में न्यूनतम समर्थन मूल्य से उसे अपने काम की मजदूरी भी नहीं मिलती है. यदि वह एक अकुशल मजदूरी के रूप में काम करता तो उसे वर्ष 2016 में 6,600 रुपये की आय होती; लेकिन उसकी वास्तविक कृषि आय 4,016 रुपये ही है.

एनएसएसओ की रिपोर्ट के मुताबिक किसान को 14.9 प्रतिशत बीज पर, 25.7 प्रतिशत उर्वरक पर, 8.3 प्रतिशत रसायनों पर, 13.3 प्रतिशत श्रम पर और 35.9 प्रतिशत सिंचाई, रखरखाव, मशीनों की मरम्मत, ब्याज, पशु देखभाल पर खर्च करना पड़ता है.

एमएस स्वामीनाथन समिति ने सिफारिश की थी कि किसान को उसके उत्पादन की लागत के ऊपर 50 प्रतिशत आय का प्रावधान होना चाहिए, ताकि वह खेती की अनिश्चितता और आपदाओं से निपट सके.

दो: सरकारी खरीदी सहज, व्यावहारिक और सहज तरीके से हो.

तीन: सिंचाई के लिए बिजली की आपूर्ति सही हो, न्यायोचित दर भी हो.

चार: सरकार खरीदी केवल गेहूं-चावल तक ही सीमित न हो. अन्य उपजों को भी संरक्षण मिले.

पांच: बीजों और उर्वरकों-कीटनाशकों की उपलब्धता किसान हित में हो. पिछले 15 सालों में इन पर निजी कंपनियों का एकाधिकार सा हो गया है.

छह: सरकार खरीदी तो करे, पर खरीदी गयी उपज को सड़ाए नहीं. पिछली बार सरकार ने इसी तरह की स्थिति में कई सौ करोड़ रुपये की प्याज खरीदी थी. वह प्याज सड़ा दी गयी. क्या यह किसान का अपमान नहीं है? अतः विकेन्द्रीकृत भण्डारण की व्यवस्था भी जरूरी है.

सात: नगर तथा ग्राम निवेश क़ानून में कुछ ऐसे प्रावधान किये गए हैं, जो किसानों के हित में नहीं हैं. जमीन के व्यापार और भवन निर्माता कंपनियों के लाभ के लिए चलाई जा रही प्रक्रियाएं किसानों का अहित कर रही हैं.

आखिर में, सरकार ने कहा कि भारतीय किसान संघ (जिसकी भूमिका पर बहुत सवाल हैं) से चर्चा के बाद किसानों के वाजिब मांगें मान ली गयी हैं, लेकिन न्यूनतम समर्थन मूल्य को लाभदायी बनाने, बिजली की कीमतों से सम्बंधित, किसानों की खेती की अनिश्चितता से सुरक्षा के प्रावधान करने, खेती की जमीन को गैर-कृषि उपयोग के लिए हस्तांतरित न करने जैसी बुनियादी शर्तों को नहीं माना गया है.

आज किसान टकराव की मुद्रा में है. यह देश और समाज के लिए अच्छा संकेत नहीं हैं. इस टकराव का मूल कारण है सरकार का अविश्वसनीय हो जाना. साभार द वायर

(लेखक सामाजिक कार्यकर्ता हैं)
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