मामा जी, कौनु फिरकी ले रहा है आपकी!


खान अशु
पग-पग वाले भैया, बहनों के भाई और उनके बच्चों के मामा.... तीन कार्यकाल, कई विवाद आए लेकिन आपकी बेहतर छवि की तेज हवाओं के सामने टिक नहीं पाए.... मकबूलियत, मशहूरियत, मन्जुरियत का सतत दौर.... मुश्किलें बढ़ाने वालों की भूमिका में गैर से ज्यादा अपने नजर आए.... बुजुर्ग साथी, युवा बुर्ज, शिक्षा से जुड़े स्वच्छ छवि वाले जानिसार से लेकर डेढ़ दर्जन 'हमदर्द' रुख्सत हो गए .... प्रदेश में 'एकला चलो रे' की सियासत के हालात बनाने में भी उन्हें सफलता मिल ही गई थी लेकिन वही किसान सारे किए धरे पर गुड़ गोबर करने पर उतारु नजर आने लगे हैं, जिनके बीच से निकलकर आने की बात करते नहीं थकते थे भिया!
प्रदेश में आन्दोलन, प्रदर्शन, मांगों को रखने का  सिलसिला सदा से चलता आया है, कर्मचारियों से लेकर डाक्टर तक, वकीलों से लेकर इन्जीनियर तक, विद्यार्थियों से लेकर सामाजिक और धार्मिक संगठन तक सड़क पर आए हैं, लेकिन वह नहीं हुआ, जो किसानों के साथ हो गया, आधा दर्जन मौत! इतनी बर्बादी तो शायद किसी छोटे-बड़े बलवे में भी नहीं हुई होगी।
किसानों के नाम पर एक, दो नहीं बल्कि पाँच बार सम्मान और पुरस्कार हासिल करने वाले प्रदेश में कुछ कदम पर फिर चुनाव खड़े हैं। विपक्ष के हाथ मुद्दों से खाली और उनकी बौखलाहट भी चरम पर जो सत्ता दल में रहते हुए भी हाशिये पर बैठा दिए गए हैं। मौके पर चौका लगा, सीधे साधे सरल कहे जाने वाले किसानों के कन्धो को इस्तेमाल किया गया और निशाने पर रख दी गई, चलते जा रही, बढ़ती जा रही और सतत बनी रहने जैसी एक शख्सियत!
किसान आंदोलन, इसमें हो रहे नुकसान को अगले चुनाव आगे रखकर अपनी मन्शाओ को पूरा करने वाले खुद को जीता मान रहे, लेकिन इस सियासत के गन्दे धन्धे में उन्होंने जो दाव पर लगा दिया है, वह दाग आसानी से धुलने जैसे नहीं हैं, कुसूरवार बेशक सजा के हकदार हैं, लेकिन उससे पहले इस बात की सच्ची परख होना जरूरी है कि असल गुनाहगार कौन है!

पुछल्ला
एक करोड़ की रेवड़ी
हताहतों को मुआवजा एक करोड़! अब उन लोगों को अपनी जिंदगी पर अफसोस होने लगा होगा कि वे बलवे में शामिल होने तो गए, लेकिन गोली ने उनके सीने को नजरअन्दाज कर दिया। या कम से कम पाँच लाख रुपए की इमदाद पाने जैसे घायल होकर तो अस्पताल की खटिया पकड़ लेते।
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