इस तरह तो बहुत से लोग अपने अपने धर्म के हिसाब से अलग अलग जानवरों में आस्था रखते हैं देखें डिटेल

जैसे बहुत से हिन्दू गोमांस खाना बुरा समझते हैं,वैसे आदिवासी जातियों में भी एक-न एक जीव-जन्तु ऐसा है कि जिसे खाना वे भी बुरा समझते हैं. उदाहरण के लिए मुंडाओं में होरो गोत्र वाले कछुआ नहीं खाते क्योंकि वे मानते हैं कि उनके गोत्र की उत्पत्ति कछुए से हुई.....
उरांव कबीले के मिंज गोत्र के लोग एक खास मछली को अपने गोत्र का पूर्वज मानते हैं और उसे पवित्र मानकर नहीं खाते हैं...
मानभूम इलाके में रहने वाली बाउरी जाति में कुत्ते को वैसे ही पवित्र और पूजनीय माना जाता है जैसे हिन्दुओं के बीच गाय को. क्या बाउरी जाति को कुत्ते की हत्या करने पर पाबंदी की मांग करनी चाहिए?...
मुंडा आदिवासियों में एक गोत्र है,तोपनो. इसका टोटेम है,हऊ(लाल-लाल चूँटे). तोपनो के लिए यह पवित्र है ,उनके वंश की उत्पत्ति इसी से हुई,ऐसा उनका विश्वास है इसलिए तोपनो हऊ को नहीं खाते. दूसरे मुंडा खाते हैं और तोपनो मुंडाओं के सामने ही खाते हैं. इस पर तोपनो मुंडा अपने पवित्र माता-पिता की रक्षा के लिए उनसे दंगा नहीं करते. गोलवलकर कहेंगे,मुंडाओं को अपने धर्म-कर्म का ज्ञान नहीं है. यानी मुंडाओं ने इस पर दंगा नहीं किया,यह उनका अवगुण है. पहले अपने दिमाग में घुसा साम्प्रदायिकता का कीड़ा बाहर निकालना होगा. फिर यह दिखाई देगा कि जिसे गोलवलकर मुंडाओं का अवगुण कहते हैं,वह अवगुण नहीं ,गुण है. .......जो लोग आदिवासियों को तुम हिन्दू हो सिखाना चाहते हैं,उन्हें पहले आदिवासियों के धर्म का आदर करना सीखना चाहिए. हो सके तो उसे अपना लेना चाहिए,इससे हिन्दू धर्म का कल्याण होगा. - प्रो.वीरभारत तलवार (आदिवासी और आर एस एस)
Kalu Ram Meena की फेसबुक वॉल से
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